नमस्कार आप सब को , मै पंकज मिश्रा ।
.......................आप सब को गांधी जयंती की ढेर सारे शुभकामनाये ...................
आज आप हमें ना डराइये , हम ना डरने वाले समझ जाइए !
कल तक तो आपके इज्जत किये , आज नहीं करेगे ये मान जाइए !!
कर लिए तुमने जितना था तुमको करना , अब हम करेग ये जान जाइए !
इस आभासी संसार में कैसी है हवा चली ?
आप सभी साँप हुए हम हो गए छिपकली !
..............................................................................................................................................
आज गाँधी जयंती के अवसर पर आपको अपने जौनपुर जिले के एक इंटर कालेज की कहानी बताता हु शायद इसके बाद मेरा मन थोडा हल्का हो जाए .
मै जिस कालेज से पढाई किया वो सरकारी है और मास्टर लोग भी सरकारी ही है . मेरा छोटा भाई भी उसी कालेज से १२वी पास किया . दुर्भाग्य से उसके अंकतालिका पर नाम गलत छप कर आ गया . मेरे भाई को अगली साल इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला लेना था अतः नाम सुधारकरवाना जरूरी था . लेकिन मेरा भाई उस वक़्त इलाहबाद में रह रहा था मै घर पर था अतः यह तय हुआ कि मै फार्म पर साइन करवा लाऊ कालेज के प्रिंसिपल का .
मै सुबह होकर गया . पता करने पर पता चला कि अंक तालिका में नाम सुधार का काम यहाँ के केमिस्ट्री पढाने वाले मास्टर साहब देखते है . मै केमिस्ट्री के लैब में पहुचा तो मास्टर साहब कुछ छात्रों के साथ लैब में बैठे थे . मै गया और आदर भाव से पैर छू लिया और अपनी समस्या एक सांस में कह डाली .
मास्टर साहब ने भी एक बार में ही रेट बता दिया ५०० रुपये नाम सुधरवाने के . मै बोला मासटर साहब ये ज्यादा नहीं है , तो मासटर साहब ने जवाब दिया कि आपका काम है करवाना हो तो कराओ नहीं तो राम राम . सारे बच्चे हस पड़े . मुझे थोडा अटपटा लगा बच्चो का इस तरह हसना तो मै भी बोल पडा - हसो मत कल को तुम्हारे साथ भी ऐसा हो सकता है.
खैर मै मासटर साहब से बोला कि आप कुछ मत करो सिर्फ मेरे ऍप्लिकेशन पर साइन कर दो मै खुद बनारस जाकर नाम सुधार करवा लूगा . मासटर साहब हैरान ये कैसे जान गया अड्डा ?
तुंरत बोले आप प्रिंसिपल साहेब के पास जाओ .
मै प्रिंसिपल साहब के कमरे की तरफ चल दिया . प्रिंसिपल साहब सामने से चले आ रहे थे . चपरासी ने बताया कि साहब को आज भौतिक विज्ञान के मासटर साहब के लडके के बरक्षा में जाना है . तभी वो इधर आ रहे है . पास में गया और पाँव छू लिया उर अपनी समस्या बताया . र्पिन्सिपल साहब ने एक टूक जवाब दे दिया . सिर्फ साइन लेना है तो कल आओ आज मै जरूरी मीटिंग में जा रहा हु . मै बोला साहब मै कल वापस अपने काम पर चला जाउगा भाई मेरा इलाहबाद में है आप इतना रहम करो साइन कर दो . प्रिंसिपल साहब गुस्सा गए और बोले तुम मुझे सीखा रहे हो क्या करना चाहिए और क्या नहीं .
मेरा भी माथा ठनका और मै एक झटके में बोल दिया कि आप तो भौतिक विज्ञान के मासटर साहब के लडके के बरक्षा में जा रहे हो मीटिंग में नहीं .
प्रिंसिपल साहब ने भी जवाब दिया , कही जाऊ पर साइन नहीं करुगा अब जाओ .
मेरा मन दुखी हो गया किसी तरह भावनाओं पर काबू पाया और बाहर सड़क पर आकार खडा हो गया . सामने से मेरे पहचान के एक पत्रकार आ रहे थी मै उनको अपनी समस्या बतायी वे बोले अप्लिकेशन मुझे दो तुम यही रुको और १० मिनट बाद पत्रकार महोदय साइन किया हुआ फार्म मुझे दे लाकर दिए .
मेरा दिमाग चकराया और सच बताऊ तो कितनी बार मेरे कालेज में अध्यापक और प्रिंसिपल को लडके लोग पिट चुके है . आज मुझे कारण भी समझ में आ गया पीटने का .
हमेशा नहीं लेकिन शायद कभी कभी इसके लिए भी पिटे गए होगे .
अब आप बताओ क्या मेरे प्रिंसिपल और मास्टर का रवैया ठीक था इस मामले में ?
.................................................................................................................................................
9 comments:
-
Arvind Mishra
on
October 2, 2009 5:34 AM
अव्वल तो वे आपके गुरू न थे और न आप उनके शिष्य -फिर भी पांव छूने से बाज नहीं आये ! और वे अपने गुरुडम से ! अब भाई मेरे वे आज के गुरु हैं ,कबीर और तुलसी के रचनालोक के नहीं -पत्रकार उनसे बेहतर तरीके से निपट सकता है और आपने सही रास्ता चुन लिया !
पत्रकार गुरु दोनों खडे काके लागूं पाय
बलिहारी पत्रकार की गुरु को दिया झपडियाय -
रविकांत पाण्डेय
on
October 2, 2009 6:44 AM
दुर्भाग्य है इस देश का कि जिनसे उम्मीद की जाती है छात्रों को सही राह दिखाने की वो खुद ही भटके हुये हैं।
-
क्रिएटिव मंच
on
October 2, 2009 7:58 AM
अफसोस है कि आपका अनुभव सुखद नहीं रहा ! सबसे बड़ी बात यह भी है कि जिनसे आपका वास्ता पड़ा वो शिक्षक भी नहीं थे !
ऐसे लोग महज अपने पेशे के दलाल होते होते हैं ....धंधेबाज होते हैं !
समाज के हर क्षेत्र में पतन हुआ है .... तो शिक्षा क्षेत्र भी कब तक बचा रहेगा ! -
ताऊ रामपुरिया
on
October 2, 2009 9:07 AM
ये तो अपने अपने अनुभव हैं. जीवन मे सब तरह के लोग होते हैं, ऐसे महारथी भी होते हैं और निहायत शरीफ़ और सज्जन शिक्षक आज भी मौजूद हैं. हां पत्रकारों से ऐसे लोग पंगा नही लेते ये पक्का है.:)
रामराम. -
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
on
October 2, 2009 9:09 AM
आपने बिल्कुल ठीक ही लिखा है-
सत्य पर असत्य की विजय देखनी हो तो
अपना हिन्दुस्तान देख लो।
इसीलिए तो कहा जाता है-
"मेरा भारत महान"
आप सब को गांधी जयंती
और पं. लालबहादुर शास्कीत्री
के जन्म-दिन की शुभकामनाएँ! -
शरद कोकास
on
October 2, 2009 3:51 PM
ऐस लोग अब तक रिटायर नही हुए है ..
-
Nirmla Kapila
on
October 2, 2009 6:39 PM
अब रास्ता ही यही रह गया है तभी ये लोग सुधरेंगे शिक्षकों के उपर देश के कर्णाधारों क को बनाने की जिम्मेदारी है ये जडें मजबूत होंगी तभी देश आगेबढेगा मगर इन लोगों ने देश का बेडा गर्क करने की ठान ली है अब लातों के भूत बातों से सुधरने वाले नहीं शुभकामनायें गाँधी जयंति पर शुभकामनायें
-
hem pandey
on
October 2, 2009 8:44 PM
आज के समय में यह घटना बहुत सामान्य लगती है. हम येन केन प्रकारेण अपना काम निकालने हेतु बाध्य होते हैं या किये जाते हैं.आप ने भी पत्रकार का सहारा ले कर अपना काम निकाल लिया. गुरूजी की धौंस पत्रकार की धौंस के आगे नहीं चल पायी.
-
Rakesh Singh - राकेश सिंह
on
October 2, 2009 8:46 PM
ऐसे लोगों की समय-समय पर सबक सिखया ही जाना ही चाहिए ... एक सबक को जैसे ही भूलने लगें ... इन्हें फिर से एक सबक सीखा दो तभी कुछ ककम हो सकता है ...
फिर भी मेरा भारत महान है !!!!!



